Saturday, August 6, 2011

दूहा अर उलटा दूहा

दूहा 

सावण आयो सायबा, दूर देश मत जाय !
तन भीज्यो बरसात में, मन में लागी लाय !!
सावण घणो सुहावणो, हरियो भरियो रूप !
निरखूं म्हारो सायबो, सावण घणो कुरूप !!
साजन उभा सामने, निरखे धण रो रूप !
बादलियाँ रे बीच में, मधुरी मधुरी धूप !!
जोगेश्वर गर्ग
उलटा दूहा
साजन घरां पधारिया, छोड़ परायो देश !
सावण बरसा बादली, अतरी अरज विशेष !!
हिवडे हरख विशेष व्हे, जद साजन घर आय !
मन री मौजां मर रही, सावण सूखो जाय !!
साजन सैणां समझग्या, आया छोड़ विदेश !
सावण तू भी समझ जा, बरसा मेह विशेष !!
जोगेश्वर गर्ग

2 comments:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...





आदरजोग भाईजी जोगेश्वर जी
घणैमान रामराम सा !


सावण रौ इस्यो फूठरो चित्रण !
साजन ऊभा सामनै, निरखै धण रौ रूप !
बादळियां रै बीच में, मधुरी मधुरी धूप !!

मन जीत लियो सा… :) लखदाद है आपनैं !

हिवड़ै हरख विशेष व्हे, जद साजन घर आय !
मन री मौजां मर रही, सावण सूखो जाय !!

विरहणी रै मन री मौजां मर रही अर उणरौ सावण सूखो जाय … आ कैय'र तो काळजो काढ लीन्हो आप पढणियां रौ :)

सावण में संजोग अर बिजोग रा आछा चितराम उकेर्'या आप । निज़र नीं लागै लेखणी नैं !

आपरी लेखणी घणी सांतरी है …
अबै इण ब्लॉग पर आपरी रचनावां पढण नैं मिळती रैसी … आ म्हारै खातर हरख री बात है… सौ सौ रंग !

लारला सगळा परव अर तिंवारां सागै
आवण आळा सैंग उछब-मंगळदिनां वास्तै
♥ मोकळी बधाई और शुभकामनावां !♥
- राजेन्द्र स्वर्णकार

vishnu kumar singh shaktawat said...